भगवान वैसे नहीं होते

Short Stories for Kids with Morals – गाँँव के मन्दिर में एक बडे धर्मात्‍मा पुजारी थे और कभी भी, किसी को दान देने के लिए उकसाते नहीं थे, न ही कभी किसी से दान-दक्षिणा की मांग करते थे। वे इतने स्‍वाभिमानी व्‍यक्ति थे कि जितना मंदिर चढ़ावे की राशि आती, उसमें से भी वे केवल उतनी ही र‍ाशि लेते थे जिससे उन दोनों दंपत्ति का जीवन-निर्वाह हो जाए, शेष राशि वे मंदिर के ट्रस्‍टी को पहुँँचा देते थे। अब उनको अहंकारी कहें या धर्मात्‍मा, उनका कहना था कि भगवान उन्‍हें जितना देना चाहते हैं, उतना चढ़ावे के रूप में ही दे देते हैं और मैं उससे ज्‍यादा की मांग नहीं कर सकता।

समय बीतता गया और पुजारी व उनकी पत्नि काफी वृद्ध हो गए। धीरे-धीरे किसी कारणवश उनकी धर्म पत्नि की तबीयत बहुत खराब रहने लगी। जब वे अपनी पत्नि को लेकर अस्‍पताल गए तो Doctor ने उनकी पत्नि की जाँच करके बताया कि, “पुजारी… आपकी पत्नि का Operation करना पड़ेगा, और Operation के लिए लगभग एक लाख रूपये तक का खर्चा आएगा। अगर आपने जल्‍दी से जल्‍दी पैसों का इंतजाम नहीं किया, तो हम इन्‍हे नहीं बचा पाऐंगे।

पुजारी ने जब ईलाज के लिए इतनी बड़ी रकम सुनी तो उनकी हालत खराब हो गई क्‍योंकि उनके पास केवल इतना ही रूपया था, जिससे वे दोनों अपना गुजारा कर सकें। उनके पास उनके पूर्वजों की कोई जमीन-जायदाद या सम्‍पत्ति आदि भी नहीं थी, जिसे बेचकर वे एक लाख रूपये का इंतजाम कर पाते। इसलिए जब उन्‍हें रूपयों का इन्‍तजाम करने के लिए कोई भी रास्‍ता समझ में नहीं आया, तो अन्‍त में वे मंदिर में ही प्रार्थना करने लगे कि, ”हे भगवान… मुझे मेरी पत्नि के ईलाज के लिए एक लाख रूपये की जरूरत है। इसलिए कृपया मुझे एक लाख रूपये दे दीजिए।

उसी रास्‍ते से एक जुआरी रोज गुजरता था, जो दिन भर की कमाई से रात को जुआ खेलता और हर रोज हार जाता था। पुजारी जब ईश्‍वर से यह प्रार्थना कर रहे थे, ठीक उसी वक्‍त वह जुआरी वहाँ से गुजर रहा था और संयोगवश उसने पुजारी की ये सारी बाते सुन ली, लेकिन वह नशे में था इसलिए पुजारी पर कोई ध्‍यान दिए बिना वहाँ से चला गया और रोज की तरह जुआ खेलने लगा।

रोज तो वह जुआरी अपनी सारी कमाई हार जाता था, लेकिन आज पता नहीं क्‍यों वह जुआरी जीत रहा था… उस रात वह जुआरी दो लाख रूपये जीत कर लौटा और उसे वह पुजारी वहीं बैठे मिले। जुआरी पुजारी के पास आकर बोला कि, ”ये एक लाख रूपये ले लीजिए और अपनी पत्नि का ईलाज करवाइए।

लेकिन पुजारी ने कहा, “मैं तुमसे ये पैसे नहीं ले सकता। मुझे मेरा भगवान आकर पैसा देगा।”

पंडित की बात जुआरी को बड़ी अजीब लगी। उसने सवाल किया- “अापका भगवान स्‍वयं आकर पैसा कैसे देगा? आप कैसे भगवान का इन्‍तजार कर रहे हैं? मैं ही भगवान हुँ। लीजिए यह पैसा और ईलाज करवाईए अपनी पन्ति का।

लेकिन वह पुजारी नहीं माना। उसने जुआरी के पैसे नहीं लिए। अन्‍त में जुआरी भी उस पुजारी से नाराज होकर चला गया और वही हुआ जो होना था। पुजारी के लिए कोई भगवान पैसे लेकर नहीं आया और पैसे जमा न करवा पाने के कारण उनकी पत्नि का ईलाज न हो सका व उसकी मृत्‍यु को प्राप्‍त हो गई।

कुछ दिन बाद वही जुआरी फिर से मंदिर के आगे से गुजर रहा था, तभी वह पुजारी के पास आया और पूछा, “क्‍या आपकी पत्नि का ईलाज हो गया? क्‍या अब वो ठीक है?

पुजारी ने प्रत्‍युत्‍तर दिया, “नहीं… वो मर गई। भगवान ने मेरी पत्नि को मार दिया। भगवान मेरे लिए एक लाख रूपये लेकर नहीं आया। इसलिए भगवान की वजह से मेरी पत्नि की मृत्‍यु हो गई।

उस जुआरी ने पुजारी से कहा, “आपकी पत्नि को भगवान ने नहीं बल्कि आपने ही मारा है, क्‍योंकि उस रात पहली बार मैं जुए में इतनी बडी रकम जीता था। शायद भगवान मेरे माध्‍यम से आपको ही वह रूपया पहुंचाना चाहते थे, इसीलिए तो जब मैं उतनी बड़ी रकम जीता, तो जाने क्‍यों मेरे मन में खयाल आया कि मैं आपको उसमें से 1 लाख रूपए दे दूं,  ताकि आप अपनी पत्नि का ईलाज करवा सकें। लेकिन आपने वो पैसे स्‍वीकार ही नहीं किए और चमत्‍कार देखिए, मैं वो सारा पैसा अगले ही दिन फिर जुए में हार गया। निश्चित ही भगवान ने मुझे वह पैसा आपके लिए ही जितवाया था, अन्‍यथा मैं अगले ही दिन फिर से सारा पैसा क्‍यों हार जाता लेकिन आप जाने किस तरह के भगवान का इंतजार कर रहे थे?

इतना कहकर जुआरी तो वहां से चला गया, लेकिन उस दिन के बाद वह पुजारी मंदिर में भगवान की पूजा-अर्चना नहीं कर पाया।

सही ही तो कहा था जुआरी ने।

वह किस तरह के भगवान का इंतजार कर रहा था?

उस मूर्ति जैसे स्‍वरूप वाले भगवान का, जिसकी वह हर रोज पूजा-अर्चना किया करता था?

क्‍योंकि भगवान की मूर्ति का वह स्‍वरूप तो किसी ऐसे इंसान ने ही बनाया था, जिसने स्‍वयं कभी भगवान को नहीं देखा था, तो वह उस मूर्ति जैसे स्‍वरूप वाले भगवान का इन्‍तजार क्‍यों कर रहा था। यदि उसके अनुसार इंसानों का भगवान दो हाथ, दो पैर वाला ही होता है, तो इस लिहाज से जानवरों का भगवान तो चार पैरों वाला होना चाहिए, पक्षियों का भगवान तो उड़ना चाहिए, पेड़-पौधों का भगवान तो कोई बहुत खास तरीके का पेड़ होना चाहिए।

नहीं। भगवान वैसा नहीं होता, जैसा वह सोंच रहा था।

भगवान का कोई स्‍वरूप नहीं हो सकता। भगवान तो एक भावना की तरह ही हो सकता है, जो किसी भी समय किसी में भी जाग्रत होकर किसी दूसरे की मदद का कारण बनता है और जब भगवान का कोई स्‍वरूप ही नहीं हो सकता, तो उसके किसी स्‍वरूप का इन्‍तजार करके उसने गलती ही की थी और सचमुच उसकी पत्नि की मृत्‍यु का कारण उसकी अज्ञानता ही थी, वह स्‍वयं ही था।

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अक्‍सर हम सभी कभी न कभी कुछ उसी तरह के भगवान की, कुछ उसी तरह के चमत्‍कार की उम्‍मीद करते हैं, जिस तरह की उम्‍मीद इस छोटी सी लघुकथा का पुजारी कर रहा था, लेकिन सच्‍चाई यही है कि दो हाथ, दो पैर वाला ऐसा कोई भगवान है ही नहीं, जो आपके प्रार्थना करने पर आपकी सेवा में हाजिर हो जाए।

आप किस भगवान की तलाश कर रहे हैं?

जिस भगवान को आपने कभी देखा ही नहीं, आप उसका कोई स्‍वरूप कैसे बना सकते हैं और जब आप अपने भगवान का स्‍वरूप ही निश्चित नहीं कर सकते, तो आप उसे पहचानेंगे कैसे?

उस पुजारी के लिए भगवान एक जुआरी के रूप में आया था, लेकिन वह पुजारी उसे नहीं पहचान सका। यदि भगवान उस जुआरी के स्‍थान पर ठीक उसी स्‍वरूप में उस पुजारी के सामने प्रकट हो जाते, जिस स्‍वरूप की वह पुजारी पूजा-अर्चना किया करता था, तब भी क्‍या गारन्‍टी है कि वह उसे कोई बहरूपिया नहीं मान लेता, क्‍योंकि उसने स्‍वयं तो कभी भगवान को देखा ही नहीं था, तो वह निश्चित कैसे करता कि उसके सामने उसी स्‍वरूप वाला जो व्‍यक्ति उसके लिए पैसे लेकर आया है, वह भगवान ही है, कोई बहरूपिया नहीं?

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One Response

  1. Digambar April 29, 2016

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