क्‍या आप इतने बुद्धिमान हैं?

Panchtantra Stories in Hindi - बगुला भगत

Panchtantra Stories in Hindi – बगुला भगत

Panchtantra Stories in Hindi – एक बगुला था। जब वह बुढ़ा हो गया तो आसानी से शिकार न कर पाने की वजह से उसके भूखे मरने की नौबत आ गई। उसी की तरह कुछ और बूढ़े बगुले भी थे, जो लगभग भूखों मरने की स्थिति में ही जी रहे थे। सो एक दिन सभी बूढ़े बगुलों ने मिलकर एक Meeting की और इस समस्‍या के समाधान के रूप में एक तरकीब पर सभी की सहमति बनी। Meeting के मुखिया बगुले का नाम था बगुला भगत।

योजना के अनुसार बगुला भगत गंगा किनारे चला गया और गंगा नदी के किनारे ऑंखें बन्‍द करके एक पैर पर खडा होकर राम-राम जपने लगा, तथा उसके सभी अन्‍य साथी गाँव-गाँव जाकर उस भक्‍त बगुले का प्रचार करते हुए कहने लगे कि- ऐ पशु-पक्षियो… गंगा किनारे एक बहुत पहुंचे हुए संत आए हैं, जो बडी ही कठिन साधना कर रहे हैं। हम सभी को वहाँ उनके दर्शन करने जाना चाहिए।

यह सुन सभी पशु-पक्षी बगुला भगत के दर्शन के लिए चल दिए। वहा पहुंच कर सभी ने देखा कि बगुला एक पैर पर खडा हो कर राम-राम जप का रहा था। कुछ ही समय में बगुला को जीव-जन्‍तु भगतजी कहने लगे। थोडी देर बाद बगुला भगत ने आँखें खोली व कहा- भाइयों… मेरी तपस्‍या से प्रसन्‍न होकर भगवान ने मुझे दर्शन दिया और कहा कि मुझे सृष्टि की सेवा करनी चाहिए। इसलिए यदि तुम मेरा आशीर्वाद प्राप्‍त करना चाहते हो, तो दूसरों की सेवा मे जुट जाओ। इस कार्य से भगवान तुम्‍हें भी दर्शन देंगे और तुम्‍हारी मनोकामनाऐं भी पूर्ण हाेंगी।

बगुले भगत का ये प्रवचन सुनकर सभी जीव-जन्‍तु बगुले भगत की जय-जयकार करते हुए बोल उठे कि- धन्‍य हैं… आप धन्‍य है।

भगतजी ने अपने प्रवचन को जारी रखते हुए आगे कहा कि- मैं सोचता हुँ कि बच्‍चों की भावी पीढी का उत्‍कृष्‍ट निर्माण करना बहुत ही बडा कार्य है।  इसलिए मैं एक विद्धयालय खोलना चाहता हुँ जिसमें आप सभी अपने बच्‍चों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजें ताकि वे भी चरित्रवान  व ज्ञानी बन सकें।

फिर क्‍या था। दूसरे ही दिन से कोयल, मुर्गा, तोता, चिडि़या, गिलहरी, सारस, मोर आदि ने अपने बच्‍चों को विद्धयालय भेजना शुरू कर दिया।

विद्धयालय चलाने से बगुला भगत को कई फायदे हुए। एक तो यही कि बच्‍चे जब विद्धयालय जाते, तो उनके लिये भोजन ले जाते जिससे बगुला भगत के शिकार करके भोजन की व्‍यवस्‍था करने की समस्‍या से छुटकारा हो गया और दूसरा ये कि भगत जी बच्‍चों से अपना काम भी करवा लेते। जैसे- कोयल से अपने पैर दबवाते, तो गिलहरी से अपनी पीठ और सारस तो उनके घर का बहुतेरा काम कर देता था।

धीरे-धीरे बगुले के विद्धयालय में विद्धयार्थियों की संख्‍या में काफी वृद्धि हो गई। सो बगुले भगत के साथ वाले अन्‍य बगुलों के लिए भी रोजगार की व्‍यवस्‍था हो गई क्‍योंकि अब वे उसी बगुले भगत के विद्धयालय में शिक्षक बन गए थे। परिणामस्‍वरूप उनके भी भोजनादि की व्‍यवस्‍था उसी प्रकार से होने लगी, जिस प्रकार से बगुला भगत की होती थी।

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इस लघुकथा का Moral ये है कि यदि आपमें बुद्धिमानी है, तो आप किसी भी प्रकार की परिस्थिति में किसी भी प्रकार की समस्‍या का समाधान निकालते हुए न केवल अपना बल्कि अपने जैसे अन्‍य लोगों का भी भला कर सकते हैं। ठीक उसी तरह से, जिस तरह से बगुले भगत ने, न केवल अपने जीवनयापन के लिए भोजन की व्‍यवस्‍था कर ली बल्कि अपने ही जैसे अन्‍य बगुलों के लिए भी समान व्‍यवस्‍था कर दी क्‍योंकि उसने अपनी बुद्धि और वि‍वेक का प्रयोग किया।

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