क्‍यों मनाते हैं दीपावली?

Information about Diwali - क्‍यों मनाते हैं दीपावली?

Information about Diwali – क्‍यों मनाते हैं दीपावली?

Information about Diwali – दीपावली दो शब्‍दों दीप और आवली से मिलकर बना शब्‍द है जिसका अर्थ दीपकों की पंक्ति होता है। यह त्‍यौहार कार्तिक मास की कृष्‍ण पक्ष की अमावस्‍या को मनाया जाता है। दीपावली का त्‍यौहार संपूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है इसलिए इस त्‍यौहार को धार्मिक और अध्‍यात्मिक दोनों ही दृष्टि से अधिक महत्‍व दिया जाता है।

सिख धर्म के लोग यह त्‍यौहार इसलिए मनाते हैं, क्‍योंकि इस दिन उनके छठे गुरू हरगोबिन्‍द सिंह जेल से रिहा हुए थे। इसी तरह से जैन धर्म के लोग इस त्‍यौहार को इसलिए मनाते हैं क्‍योंकि इसी दिन जैन संप्रदाय के चौबीसवें तीर्थकार महावीर स्‍वामी का निर्वाण हुआ था। जबकि नेपालियों के लिए यह त्‍यौहार इसलिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि इस दिन नेपाल में नया वर्ष प्रारम्‍भ होता है। लेकिन इन सभी के अलावा भी दिवाली का त्‍यौहार मनाने के संदर्भ में दो पौराणिक कथाऐं बहुत प्रचलित हैं-

भगवान राम की पौराणिक कथा के अनुसार

पौराणिक काल की बात है वैजयंत नामक नगर में अनेक प्रकार की मायाओं का ज्ञाता तिमिध्‍वज रहता था जो संबर के नाम से प्रसिद्ध था। उसने एक बार जल के देवता इन्‍द्र को युद्ध के लिए ललकारा। इसलिए दशरथ और कैकेयी भी युद्ध में इन्‍द्र की सहायता करने के लिए गये।

युद्ध प्रारंभ हुआ और बहुत ही भंयकर युद्ध चल रहा था कि इसी बीच दशरथ घायल होकर बेहोश हो गए। राजा दशरथ के बेहोश होने पर कैकेयी उन्‍हें रणक्षेत्र से बाहर ले गई। जब राजा दशरथ होश में आए, तो कैकेयी के इस कार्य के से प्रसन्‍न होकर उन्‍हें दो वरदान माँगने के लिए कहा। तब कैकेयी ने राजा दशरथ से कहा कि- महाराज… आज नहीं किसी ओर दिन जब मुझे जरूरत होगी, तब मैं आपसे ये दो वरदान मागुँगी।

राजा दशरथ ने कैकेयी से कहा- महारानी… जैसी आपकी ईच्‍छा।

समय बीतता गया और एक समय ऐसा आया जब भगवान राम अपने सभी भाईयों के साथ गुरूकुल से शिक्षा ग्रहण कर अयोध्‍या लौटे। तब राजा दशरथ ने सोचा कि राम का राज्‍यभिषेक करके उन्‍हें अयोध्‍या का राजा बना दिया जाए। लेकिन राम के अयोध्‍या का राजा बनने की बात सुनकर देवतागणों को चिंता होने लगी कि अगर राम अयोध्‍या के राजा बन गए तो रावण का वध करना असंभव हो जाएगा क्‍योंकि राम का अवतार ही रावण के वध के लिए हुआ था।

अत: सभी देवतागणों ने आपस में विचार-विमर्श कर इस समस्‍या के समाधान के लिए बुद्धि की देवी माता सरस्‍वती के पास पहुंचे और अपनी समस्‍या बताकर कुछ उपाय करने का निवेदन किया।

इस समस्‍या के समाधान के रूप में माता सरस्‍वती ने कैकेयी की दासी मन्‍थरा की बुद्धि को भ्रमित कर दिया और मन्‍थरा की सलाह पर कैकेयी कोपभवन में चली गईं। जब राजा दशरथ कैकेयी को मनाने के लिए कोपभवन में पहुंचे, तो कैकेयी ने उन्‍हे याद दिलाते हुए कहा कि- महाराज… याद है आपने मुझे दो वरदान माँगने के लिए कहा था।

राजा दशरथ ने कहा- हाँ महारानी… याद है।

तब महारानी कैकेयी ने वरदान में माँगा कि- भरत का राज्‍याभिषेक और राम को चौदह वर्षों का वनवास

परिणामस्‍वरूप राजा दशरथ को महारानी कैकेयी के दोनों वरदानों को पूरा करना पडा जिसके परिणामस्‍वरूप भरत का राज्‍यतिलक हुआ और राम को चौदह वर्षों के लिए वनवास जाना पडा।

इसलिए जब अपने चौदह वर्षो के वनवास के दौरान राम, लंका के अत्‍याचारी राजा रावण का वध करके पुन: अयोध्‍या को लौटे, तो उनके आने की खुशी में पूरे अयोध्‍या में घी के दीए जलाकर सम्‍पूर्ण अयोध्‍या को जगमगा दिया था। उन दीयों की रो‍शनी से कार्तिक मास की काली अमावस्‍या की रात भी चमक गई थी। इसलिए उसी दिन से कार्तिक मास की अमावस्‍या को दीवाली के रूप में मनाया जाने लगा।

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हिरणकशिपु की पौराणिक कथा के अनुसार

विष्‍णुपुराण के अनुसार दैत्‍यों के आदिपुरूष  कश्‍यप और उनकी पत्नि दिति के दो पुत्र हुए थे, जिनका नाम हिरणकशिपु और हिरण्‍याक्ष रखा गया था। हिरणकशिपु की बहन का नाम होलिका था और हिरणकशिपु के एक पुत्र था, जिसका नाम प्रहलाद था।

हिरणकशिपु ने ब्रह्मा जी की कठिन तपस्‍या की जिससे प्रसन्‍न हो ब्रह्मा जी ने हिरणकशिपु से वरदान माँगने के लिए कहा। तब हिरणकशिपु ने भगवान ब्रह्मा जी से ये वरदान माँगा कि- मैं अमर होना चाहता हुँ। मुझे अमरता का वरदान दीजिए।

हिरणकशिपु के ऐसा वरदान मांगने पर ब्रम्‍हाजी ने कहा कि- इस संसार में जो भी जीव जन्‍म लेता है, उसकी मृत्‍यु निश्चित है। इसलिए अमरता का वरदान देना सम्‍भव नहीं है।

हिरणकशिपु राक्षस कुल से था जिसकी बुद्धि भी राक्षसी थी। इसलिए उसने ब्रम्‍हाजी को शब्‍दों में उलझाने की कोशिश करते हुए अमरता के ही वरदान को इस तरह से मांगा कि- मुझे न तो कोई मनुष्‍य मार सके, न ही कोई पशु मार सके। मुझे न तो कोई दिन में मार सके, न ही रात में मार सके। मुझे न तो कोई घर के अंदर मार सके, न ही घर के बाहर मार सके। मुझे न तो कोई किसी अस्‍त्र से मार सके और न ही किसी शस्‍त्र से मार सके।

ब्रह्मा जी ने उसे “तथास्‍तु” कहकर वरदान दिया और अदृश्‍य हो गए।

हिरणकशिपु को लगा कि अब उसे कोई भी कभी भी किसी भी तरीके से नहीं मार सकता है। इसी कारण से उसने सभी जीवों, यक्षों, देवतागणों आदि को परेशान करना शुरू कर दिया व इन्‍द्र के राज्‍य को भी छीन लिया।

हिरणकशिपु के राज्‍य में सब लोग केवल और केवल भगवान विष्‍णु की ही पूजा-आराधना करते थे, लेकिन हिरणकशिपु को ये पसंद नहीं था कि उसके राज्‍य के सभी लोग भगवान विष्‍णु की पूजा करे। क्‍योंकि वह स्‍वयं को ही भगवान मानता था व भगवान विष्‍णु से अत्‍यधिक इर्ष्‍या करता था।

अत: हिरणकशिपु ने अपने राज्‍य में विष्‍णु की पूजा-आराधना का निषेध करवा दिया था, परिणामस्‍वरूप कोई भी व्‍यक्ति यदि विष्‍णु की पूजा-अर्चना करता था, तो उसे मृत्‍यु दण्‍ड दे दिया जाता था। हिरणकशिपु ने सभी राज्‍यवासियों को अपना डर दिखाकर स्‍वयं की पूजा करवाना शुरू करवा दिया।

लेकिन हिरणकशिपु का पुत्र प्रहलाद तो भगवान विष्‍णु का बहुत ही परम भक्‍त और उपासक था इसलिए अपने पिता हिरणकशिपु के द्वारा कई प्रकार की यातना एवं प्रताडना देने के बावजूद भी प्रहलाद ने भगवान विष्‍णु की पूजा-आराधना करना बंद नहीं किया। हिरणकशिपु ने क्रोधित होकर अपनी बहन होलिका से कहा कि- बहन होलिका… तुम्‍हे तो वरदान है कि तुम अग्नि से नहीं जलोगी। इसलिए तुम प्रहलाद को गोदी में लेकर अग्नि में बैठ जाओ, जिससे ये अग्नि में जलकर भस्‍म हो जाए।

होलिका ने वैसा ही किया जैसा उसके भाई हिरणकशिपु ने कहा था। लेकिन जब होलिका ने प्रहलाद को अपनी गोदी में बिठाकर अग्नि में प्रवेश किया तो स्थिति एकदम विपरीत हो गई तथा प्रहलाद के बजाय होलिका स्‍वयं ही उस अग्नि में जलकर भस्‍म हो गई व भगवान विष्‍णु ने भक्‍त प्रहलाद की रक्षा कर उसे सुरक्षित बचा लिया।

यह घटना देखकर हिरणकशिपु और अधिक क्रोधित हो गया क्‍योंकि होलिका को न जलने का वरदान प्राप्‍त था फिर भी वह जल गई और प्रहलाद सुरक्षित रूप से बचे रह गए जो कि अभी भी भगवान विष्‍णु की ही उपासना कर रहे थे।

अब हिरणकशिपु ने प्रहलाद को मारने का एक ओर तरीका निकाला। हिरणकशिपु ने एक लोहे के खंभे को आग में तपाकर लाल करवाया और प्रहलाद से कहा कि- पुत्र प्रहलाद… इस जले हुए लाल खंभे को अपने गले से लगाओ।

प्रहलाद को तो कुछ पता ही नहीं था कि इस दुनिया में क्‍या हो रहा है, वह तो केवल भगवान विष्‍णु की ही उपासना में लगा रहता था और इसीलिए उसने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए उस आग से तपाऐ हुए लाल खंभे को अपने गले से लगाने के लिए जैसे ही आगे बढा, तो प्रहलाद को बचाने के लिए स्‍वयं विष्‍णु भगवान, नरसिंह अवतार लेकर उस आग से तपाऐ हुए लाल खंभे से प्रकट हुए।

नरसिंह रूप में विष्‍णु भगवान ने प्रकट होकर हिरणकशिपु को महल के प्रवेश द्वार जिसे दहलीज भी कहते हैं, पर ले गए जो न तो घर के भीतर था और न हीं घर के बाहर है। गोधूलि बेला थी जो न तो दिन था और ना ही रात। नरसिंह रूप में आधा मनुष्‍य था और आधा पशु था, जो न तो पूरी तरह से मनुष्‍य था और न ही पशु। ऐसा नरसिंह रूप लेकर भगवान विष्‍णु ने हिरणककिशपु को अपने जंघे पर लिटाया, जो न तो धरती में था और न ही आसमान में, अपने तीखे लंबे तेज नाखूनों से मारा था जो न तो अस्‍त्र था, न ही कोई शस्‍त्र था।

इस प्रकार से हिरणकशिपु को अनेक वरदान प्राप्‍त थे, लेकिन फिर भी वह अपने अत्‍याचारों, पापों तथा दुष्‍कर्मों के कारण भयानक मौत को प्राप्‍त हुआ।

जिस दिन भगवान विष्‍णु ने हिरणकशिपु का वध किया था, उस दिन को दीवाली के त्‍यौहार के रूप में मनाया जाता है।

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हिरणकश्‍यप या हिरणकशिपु ?

हिरण्यकशिपु के नाम के विषय पर हमेशा ही मतभेद रहता है क्‍योंकि कुछ स्थानों पर उसे हिरण्यकश्यप कहा गया था और कुछ स्थानों पर हिरण्यकशिपु कहा गया था।

मान्‍यता ये है कि जब उसका जन्‍म हुआ, तब उसका नाम हिरण्यकश्यप ही था, लेकिन बाद में वह बहुत ही भयानक दानव बन गया था और उसके अत्‍यधिक अत्‍याचारी हो जाने के कारण ही उसे हिरणकशिपु नाम से जाना जाने लगा क्‍योंकि संस्कृत में कषि का अर्थ हानिकारक, अनिष्टकर, पीड़ाकारक होता है।

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