Mahalaya – Shradh – श्राद्ध – पितृपक्ष – क्‍यों न खरीदें नया सामान?

Mahalaya - Shradh - श्राद्ध - पितृपक्ष - क्‍यों न खरीदें नया सामान?

Mahalaya – Shradh – श्राद्ध – पितृपक्ष – क्‍यों न खरीदें नया सामान?

Mahalaya – मैं पितृपक्ष्‍ा के संदर्भ में केवल अपना अनुभव बताना चाहता हुं जिसे पिछले कुछ सालों के अपने निष्‍पक्ष भाव से किए गए प्रयोगों द्वारा समझने का प्रयास किया है।

पितृपक्ष के संदर्भ में मेरा अनुभव ये रहा है कि इस दौरान मैंने जो भी चीज खरीदी है, उससे मैंने सुख से ज्‍यादा दु:ख उठाया है।

2011-12 में मैं मेरा एक कम्‍प्‍यूटर सेन्‍टर लगाना चाहता था, जिसकी शुरूआत मैंने पितृपक्ष में की थी, और वो सेन्‍टर कभी पूरी तरह से बनकर तैयार नही हो सका। बल्कि उसके पूरे Setup में मैंने लगभग 50 हजार का Direct और लगभग इतना ही Indirect नुकसान उठाया। जबकि सेन्‍टर बनाने से सम्‍बंधित फर्नीचर आदि का काम करने वाले मेरी जान-पहचान के लोग ही थे, जिनसे इस सेन्‍टर से सम्‍बंधित फर्नीचर आदि का काम करवाने को लेकर बहस हुई और लम्‍बे समय से उनके साथ चले आ रहे हमारे सामान्‍य सम्‍बधों में कडवाहट आ गई।

इसी तरह से 2012-13 में इसी अवधि के दौरान मैंने अनजाने में ही एक Tablet PC खरीद लिया, जिसे अगले 15 दिनों के दौरान मैंने तीन बार चैन्‍ज करवाया। अन्‍त में उसी Tablet PC की वजह से उस दुकानदार से बहस हो गई और लम्‍बे समय से चले आ रहे हमारे मधुर सम्‍बंधों के बीच हमेंशा के लिए एक गांठ पड़ गई। उस Tablet PC के बाद उस दुकान से मैंने कभी कोई सामान नहीं खरीदा।

हो सकता है कि ये केवल एक संयोग हो, लेकिन ऐसा केवल मेरे ही साथ हुआ हो, तो मैं इसे संयोग मान सकता हुं। इसी अवधि के दौरान मेरे भाई ने भी पिछले साल कुछ काम शुरू किया था, और उसका वो काम पूरी तरह से फेल हुआ।

इसी तरह से मेरे एक मित्र से इस संदर्भ में बात होने पर उन्‍होंने भी एक नया काम शुरू करने के लिए नवरात्रि का समय तय किया। मेरे पूछने पर कि वे नवरात्रि में ही वो काम क्‍यों करेंगे, तो उनका कहना था कि वे श्राद्ध में शुरू किए गए अपने कार्य का दु:ख अच्‍छी तरह से भोग चुके हैं और वे दुबारा कोई नया काम श्राद्ध पक्ष में नहीं करना चाहते।

अत: मुझे ये लगता है कि सभी लाेगों के साथ समान संयोग तो नहीं हो सकता और इसी तरह की घटनाऐं उन लोगों के साथ भी हुई होंगी, जिन्‍होंने ये नियम बनाया कि पितृपक्ष के दौरान कोई नया सामान नहीं खरीदना चाहिए, न ही कोई मांगलिक कार्य करना चाहिए।

पितृपक्ष के संदर्भ में मेरा अनुभव ये कहता है कि इस अवधि के दौरान यदि कोई चीज खरीदते हैं, तो वो चीज सुख से ज्‍यादा दु:ख ही देती है और उसे खरीदने पर मानसिक शान्ति के स्‍थान पर मानसिक अशान्ति का अनुभव होता है।

चाहे अनजाने में ही किसी चीज को इस समयावधि में क्‍यों न खरीदा गया हो, और चाहे आपको पता ही न हो कि आपने अपनी किसी मनपसन्‍द और लम्‍बे समय से चाही गई चीज को पितृपक्ष में खरीद लिया है, फिर भी आपको वह चीज ठीक नहीं लगती और इतना ही हो तो भी कोई बात नहीं, अक्‍सर इस समयावधि में खरीदी गई नई चीजें किसी के साथ लम्‍बे समय से चले आ रहे हमारे सम्‍बंधों को खराब करने में भी अपना रोल प्‍ले करती है।

सवाल ये है कि परम्‍परानुसार ही सही, हमारे धर्मग्रंथों में, पितृपक्ष की अवधि में कोई मांगलिक कार्य करने अथवा कोई नई चीज खरीदने से क्‍यों मना किया जाता रहा है?

इस संदर्भ में मेरा मत ये है कि सामान्‍यत: जब हम हमारी किसी बात को, किसी दूसरे को समझाना चाहते हैं, तो उसे समझाने के लिए हम कई तरीके उपयोग में लेते हैं, हम उदाहरण देते हैं, हम किसी घटना का संदर्भ देते हैं, और यदि सम्‍भव हो तो हम कोई प्रायोगिक तरीका भी बताते हैं, जिससे हमारी बात सिद्ध हो सके आैर यदि हम इसी बात को हमारे पुराने धर्मग्रंथों, वेदों, पुराणों पर लागु करें, तो उनमें हर बात को समझाने के लिए एक कहानी या एक पौराणिक घटना का उल्‍लेख मिलता है और पितृपक्ष के संदर्भ में भी हमें कई पौराणिक कहानियां पढने को मिलती हैं।

ठीक ऐसे ही पितृपक्ष वह समय होता है, जब किए गए ज्‍यादातर कार्य भविष्‍य में तकलीफदेह साबित होते हैं और जब ये बात हमारे धर्मग्रंथ लिखने वाले उस समय के वैज्ञानिकों को पता चली होगी, तो उन्‍होंने इस बात को पितृपक्ष नाम देकर उसे हमारे पूर्वजों के साथ जोड दिया ताकि लोग अपने पूर्वजों की सेवा, ध्‍यान, तर्पण, दान, श्राद्ध आदि में ही इस समयावधि को व्‍यतीत कर दें और कोई नया अथवा मांगलिक काम न करें, जो कि भविष्‍य में उनकी तकलीफ का कारण बने।

क्‍या आप मेरी इस मान्‍यता से सहमत हैं? क्‍या आपको भी लगता है कि श्राद्ध पक्ष के दौरान कोई नया सामान नहीं खरीदना चाहिए अथवा कोई मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए?

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