सम्‍पूर्ण दुर्गा चालीसा

Durga Chalisa in Hindi - सम्‍पूर्ण दुर्गा चालीसा

Durga Chalisa in Hindi – सम्‍पूर्ण दुर्गा चालीसा

Durga Chalisa in Hindi – दुर्गा चालीसा ए‍क अदभुत चालीसा है, क्‍योंकि यदि कोई व्‍यक्ति दुर्गा-सप्‍तशती का पाठ करने में असमर्थ है, तो वह नवरात्रि के दौरान माँ दुर्गा के विभिन्‍न रूपों की आराधना करने के लिए दुर्गा-चालीसा का पाठ कर सकता है और ऐसी मान्‍यता है कि दुर्गा चालीसा में भी वही शक्ति व प्रभाव है, जो दुर्गा पाठ में है इसलिए दुर्गा चालीसा के पाठ से भी वही ऊर्जा व फल प्राप्‍त होता है, जो चण्‍डी-पाठ या दुर्गा-सप्‍तशती के पाठ से मिलता है।

इस दुर्गा चालीसा के संदर्भ में भी एक पौराणिक कथा है कि एक बार ऋषियों ने सुकदेव जी महाराज से पूछा कि- हे महामुनी… अगर काई ऐसी स्थिति हो जाए कि कोई मनुष्‍य माँ दुर्गा को प्रसन्‍न करने के लिए दुर्गा-सप्‍तशती का पाठ न कर सके तो क्‍या उस मनुष्‍य को माँ की कृपा प्राप्‍त नही हो सकती ?

ऋषिमुनियों कि सवाल के जवाब में सुकदेव जी ने कहा कि- जो व्‍यक्ति मां दुर्गा की आराधना करने के लिए दुर्गा-सप्‍तशती का पाठ नहीं कर सकता, वह व्‍यक्ति दुर्गा-चालीसा का पाठ कर सकता है जो कि एक ऐसी चालीसा है, जिसके पाठ करने से भी देवी-पाठ यानी चण्‍डी-पाठ के समान ही पुण्‍य मिलता है लेकिन चण्‍डी-पाठ की तरह इसे करने की विधि में यदि कोई गलती हो जाए या उच्‍चारण आदि का दोष रह जाए, तो वैसा कोई नुकसान नहीं होता, जैसा चण्‍डी-पाठ के मंत्रोच्‍चारण या विधि में गलती होने पर होता है। 

सुखदेवजी के अनुसार- जो मनुष्‍य दुर्गा चालीसा का पाठ प्रति दिन करता है, उस मनुष्‍य के सारे पाप कर्म का नाश हो जाता है तथा मनुष्‍य के सभी दु:ख दूर हो जाते हैं और वह संसार का सुख भोग कर अन्‍त में बैकुण्‍ठ धाम को जाता है।

सुकदेवजी ने आगे कहा- जो व्‍यक्ति दुर्गा चालीसा  पाठ करके घर से निकलता है, तो वह जिस कार्यपूर्ति के लिए घर से निकलता है, उसका वह कार्य जरूर पूरा होता है। साथ ही वह अन्‍जान खतरों से सुर‍क्षित रहता है क्‍योकि देवी की कृपा उस मनुष्‍य पर बनी रहती है जिसने दुर्गा चालीसा का पाठ किया हुआ है और मां दुर्गा की कृपा जिस किसी भी मनुष्‍य पर होती है, उसकी कभी अकाल मृत्‍यु नहीं होती।

इस प्रकार से सुकदेवजी के कहे अनुसार उन लोगों के लिए दुर्गा-चालीसा का वर्णन किया गया, जो संस्‍कृत भाषा में कुशल नहीं हैं, जिसकी वजह से उनके द्वारा दुर्गा-सप्‍तशती के संस्‍कृत भाषी श्‍लोकों का पूर्ण शुद्धता के साथ उच्‍चारण करना सम्‍भव नहीं हैं और यदि उच्‍चारण पूर्ण शुद्धता के साथ न हो तो मां दुर्गा के खुश होने की बजाय कुपित होने की सम्‍भावना ही ज्‍यादा रहती है। इसलिए इस प्रकार के लोगों के लिए मां दुर्गा की आराधना व उपासना करने हेतु ही दुर्गा-चालीसा की रचना की गई है।

शास्‍त्रों में वर्णित है, कि दुर्गा चालीसा का पाठ नवरात्रि या शुक्रवार के दिन किया जाए, तो शक्ति उपासना के नजरिए से ये समय बहुत ही असरदार होता है। साथ ही जीवन को विभिन्‍न प्रकार की दुर्घटनाओं व मुसीबतों से बचाने के लिए दुर्गा-चालीसा पाठ का अत्‍यधिक महत्व बताया गया है क्‍योंकि यह चालीसा, देवी की अद्भुत शक्तियों और स्वरूप का ही स्मरण है, जिसका प्रतिदिन का पाठ व्‍यक्ति को ऊर्जावान बनाए रखता है, साथ ही दुर्घटनाओं व मुसीबतों से भी बचाता है। जबकि इस दुर्गा चालीसा का पाठ नवरात्रि के दौरान करने पर इसका शक्ति व प्रभाव और अधिक बढ जाता है।

हालांकि चण्‍डी-पाठ करते समय विधि का अक्षरश: पालन करना जरूरी होता है, लेकिन दुर्गा चालीसा  का पाठ देवी की सामान्य पूजा से भी किया जा सकता है, जिसके अन्‍तर्गत गंध, फूल, अक्षत, धूप, दीप आदि के माध्‍यम से सामान्‍य पूजा कर दुर्गा चालीसा कर सकते हैं।

दुर्गा चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥
निराकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लय कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा॥
धरा रूप नरसिंह को अम्बा। प्रगट भईं फाड़कर खम्बा॥

रक्षा कर प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर-खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजे॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगर कोटि में तुम्हीं विराजत। तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप को मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावे। मोह मदादिक सब विनशावै॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥

जब लगि जियउं दया फल पाऊं। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥
दुर्गा चालीसा जो नित गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥

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