धनतेरस – नरक चतुर्दशी – क्‍या, क्‍यों और कैसे?

Dhanteras Puja Vidhi - धनतेरस - नरक चतुर्दशी - क्‍या, क्‍यों और कैसे?

Dhanteras Puja Vidhi – धनतेरस – नरक चतुर्दशी – क्‍या, क्‍यों और कैसे?

Dhanteras Puja Vidhi – धनतेरस को कार्तिक मास की कृष्‍ण त्रयोदशी को मनाया जाता है। इस दिन मृत्‍यु के देवता यम और भगवान धनवंतरी की पूजा की जाती है क्‍योंकि इसी दिन भगवान धनवंतरी ने अवतार लिया था।

जब राक्षसों और देवताओं ने मिलकर समुन्‍द्र मंथन किया तो उसमें से चौदह रत्‍नों की प्राप्ति हुई और इन सभी में अमृत सबसे मुख्‍य रत्‍न था क्‍योंकि इसे पीकर अमर हुअा जा सकता था। इस अमृत को लेकर भगवान धनवंतरी कार्तिक मास की कृष्‍ण त्रयोदशी को ही प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन को भगवान धनवन्‍तरी के जन्‍मदिन के रूप में मनाया जाता है व धनतेरस के नाम से भी जाना जाता है।

जब धनवन्‍तरी प्रकट हुए थे तो उनके एक हाथ में अमृत तथा दूसरे हाथ में आयुर्वेद और आयुर्वेद से सम्‍बंधित अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ थी। इसलिए भगवान धनवंतरी के साथ ही आयुर्वेद का जन्‍म भी इसी दिन हुआ था और इसीलिए भगवान धनवंतरी को पृथ्‍वी का पहला चिकित्‍सक भी कहा जाता है। साथ ही अमृत जिस कलश में था, वह सोने का कलश था, इसलिए धार्मिक मान्‍यतानुसार ऐसा माना जाता है कि इस दिन यदि सोना या सोने से बनी धातु खरीदना शुभ होता है।

धनतेरस को मृत्‍यु के देवता यम की भी पूजा आराधना की जाती है और इसी दिन से लेकर लाभ पांचम तक घर के द्वार पर कम से कम एक दीपक जलाकर रखते है। मान्‍यता यह है कि यदि इस दिन यम देवता की पूजा आराधना की जाती है, तो यदि घर में अकाल मृत्‍यु का योग हो, तो वह टल जाता है क्‍योंकि यह दीपक मृत्‍यु के देवता यम को प्रसन्‍न करने के लिए जलाया जाता है। इस तथ्‍य के संदर्भ में एक पौराणिक कथा ये है कि-

एक दिन यमराज की सभा में सभी यमदूतों को बुलाकर उनसे पूछा गया कि- जब आप सभी पृथ्‍वी पर किसी के प्राण हरने जाते हैं, तो क्‍या आप का मन दु:खी नही होता?

इस सवाल के जवाब में एक यमदूत ने कहा- महाराज… इसमें दु:ख की क्‍या बात है, यह तो हमारा कर्त्तव्‍य है‍ जिसे हमें पूरा करना होता है। परन्‍तु जब किसी की अकाल मृत्‍यु के कारण हमें उसके प्राण हरने होते हैं, तब हमें बड़ा दु:ख होता है।

इसी प्रकार से एक और यमदूत ने राजा हेम के पुत्र के संदर्भ में एक घटना सुनाई, जिसके कारण उसे राजा हेम के पुत्र के प्राण हरने पडे थे। घटना इस प्रकार थी कि-

बहुत समय पहले राजा हेम हुआ करते थे। उनके घर भगवान की कृपा से उन्‍हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। उस जमाने में जैसे ही घर में बालक या बालिका का जन्‍म होता था, तो ऋषिमुनि या पंडितों को बुलाकर उनसे उस बालका या बालिका की जन्‍म-कुण्‍डली बनावाई जाती थी व उस नवजात के भविष्‍य के संदर्भ में इन उन ऋषिमुणी या पंडितों के द्वारा भविष्‍यवाणी की जाती थी, और वे भविष्‍यवाणियां शत् प्रतिशत सही भी होती थीं।

इसलिए राजा हेम ने भी ऋषिगणों को बुलावा भेजा जिन्‍होंने गणना करके उस बालक की कुण्‍डली बनाई। लेकिन जब उन्‍होंने उस बालक की जन्‍म-कुण्‍डली का विश्‍लेषण किया तो वे थोडे दु:खी हुए व उस बालक के संदर्भ में भविष्‍यवाणी करने से आनाकानी करने लगे। लेकिन राजा के दबाव डालने उन्‍होंने उस बालक के संदर्भ में भविष्‍यवाणी की कि यदि इस बालक का विवाह हुआ तो यह विवाह के चौथे दिन ही मृत्‍यु को प्राप्‍त हो जाएगा।

राजा ऋषिगणों की ये भविष्‍यवाणी सुनकर बहुत दु:खी हुए लेकिन उन्‍होंने धर्य नही खोया और निश्‍चय किया कि वे अपने पुत्र पर किसी स्‍त्री की परछाई तक नही पड़ने देंगे, ताकि न उसका विवाह होगा, न ही उसकी मृत्‍यु होगी। साथ ही उन्‍होंने अपने पुत्र को ऐसी जगह पर भेज दिया जहाँ कई वर्षों तक वह केवल पुरूषों के बीच ही रहा और बड़ा हुआ।

लेकिन भगवान की कृपा ऐसी हुई की एक दिन एक राजकुमारी से उस बालक का आमना-सामना हो गया और दोनों ने एक दुसरे को देखते ही पसन्‍द कर लिया। इतना ही नहीं,  दोनों ने बिना किसी को बताए चुपके से गन्‍धर्व विवाह कर लिया। परिणामस्‍वरूप ऋषिगणों की भविष्‍यवाणी सही हुई और विवाह से ठीक चार दिन बाद हम उसके प्राण हरण करने पहुंचे। लेकिन जब हम उसके प्राण हरण कर लौटने लगे, तो उस नव विवाहित राजकुमारी का विलाप सुनकर हमारा ह्रदय भी अत्‍यधिक दु:खी हुआ।  

ये कहानी सुन सभा में कुछ देर के लिए पूरी तरह से सन्‍नाटा छा गया। फिर एक यमदूत ने यमराज से विनती की कि- हे महाराज… मृत्‍यु तो सभी की होनी ही है, जो कि सभी जीवों को स्‍वीकार्य भी है किन्‍तु अकाल मृत्‍यु को रोकने का कोई उपाय होना चाहिए।

जब यमराज ने कहा- यदि कार्तिक मास के कृष्‍ण पक्ष की तेरस को जो भी प्राणी अपने घर की दक्षिण दिशा में मेरे नाम से पूजा करके दीपक जलायेगा, उसके परिवार में अकाल मृत्‍यु नहीं होगी।

साथ ही ये भी मान्‍यता है कि दीपदान करते समय यदि निम्‍न मंत्र का जाप किया जाए तो यमराज और अधिक प्रसन्‍न होते है-

मृत्‍युना पाशहस्‍तेन कालेन भार्यया सह।
त्रयोदश्‍यां दीपदानात्‍सूर्यज: प्रीयतामिति।। 

इसके अलावा धनतेरस के दिन यमराज को प्रसन्‍न करने के लिए यमुना स्‍नान भी किया जाता है अथवा यदि यमुना स्‍नान सम्‍भव न हो तो, स्‍नान करते समय यमुना जी का स्‍मरण मात्र कर लेने से भी यमराज प्रसन्‍न होते है क्‍योंकि हिन्‍दु धर्म की ऐसी मान्‍यता है कि यमराज और देवी यमुना दोनों ही सूर्य की संताने होने से आपस में भाई-बहिन हैं और दोनों में बड़ा प्रेम है। इसलिए यमराज, यमुना का स्‍नान करके दीपदान करने वालों से बहुत ही ज्‍यादा प्रसन्‍न होते और उन्‍हें अकाल मृत्‍यु के दोष से मुक्‍त कर देते है।

नरक चतुर्दशी व रूप चौदस

धनतेरस के दूसरे दिन नरक चतुर्दशीरूप चौदस का दिन भी माना जाता है। इस दिन रूप और सौंदर्य प्रदान करने वाले देवता श्री कृष्‍ण को प्रसन्‍न करने के लिए उनकी पूजा की जाती है, क्‍योंकि इसी दिन भगवान श्री कृष्‍ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध करके और बरासुर के द्वारा बंदी बनाई गई सौलह हजार एक सौ आठ कन्‍याओं को उस राक्षस की कैद से मुक्‍त किया था।

ऐसी मान्‍यता भी है कि इस दिन भगवान कृष्‍ण ने राक्षस नरकासुर का वध करके धरती पर से गन्‍दगी साफ की थी, इसलिए लोग इस दिन अपने घर की साफ-सफाई जरूर करते है।

ऐसा कहा जाता है कि इस दिन घर की सफाई के साथ-साथ जो भी अच्‍छा रूप और सौंदर्य प्राप्‍त करना चाहते हैं, वे अपने शरीर पर उबटन लगाकर स्‍नान करतें है, जिससे की उनकी सुन्‍दरता और बढ़ती है। साथ ही सरसों का तेल पूरे शरीर पर लगाकर स्‍नान करने से भी रूप व सौंदर्य की प्राप्ति होती है साथ ही सरसों का तेल, यमराज को भी बहुत प्रिय है इसलिए सरसों का तेल शरीर पर लगाकर स्‍नान करने से अकाल मृत्‍यु की सम्‍भावना भी समाप्‍त हो जाती है।

शास्‍त्रों का ऐसा निर्देश भी है कि पूरे कार्तिक मास में शरीर पर तेल नहीं लगाया जाना चाहिए लेकिन रूप चतुर्दशी को सरसों का तेल जरूर लगाना चाहिए।

धनतेरस पूजा विधि

  • धनतेरस को मृत्‍यु के देवता यमराज जी की पूजा करने के लिए सन्‍ध्‍या के समय एक वेदी(पट्टा) पर रोली से स्‍वास्तिक बनाइये।
  • उस स्‍वास्तिक पर एक दीपक रखकर उसे प्रज्‍ज्‍वलित करें और उसमें एक छिद्रयुक्‍त कोड़ी डाल दें।
  • अब इस दीपक के चारों ओर तीन बार गंगा जल छिड़कें।
  • दीपक को रोली से तिलक लगाकर अक्षत (आखे चावल) और शक्‍कर, मिष्‍ठान आदि चढाएं।
  • इसके बाद इसमें कुछ दक्षिणा आदि रख दीजिए जिसे बाद में किसी ब्राह्मण आदि दान कर दें।
  • अब दीपक पर कुछ पुष्‍पादि अर्पण करें।
  • इसके बाद हाथ जोड़कर दीपक को प्रणाम करें और परिवार के प्रत्‍येक सदस्‍य को तिलक लगाएं।
  • अब इस दीपक को अपने मुख्‍य द्वार के दाहिनी और रख दीजिए।

यम पूजन करने के बाद अन्‍त में धनवंतरी पूजा करें, जिसके अन्‍तर्गत कम से कम 108 बार ऊँ धं धन्‍वन्‍तरये नम: का जाप करें। जब जाप पूरा हो जाए तो इसे भगवान धनवंतरी को समर्पित कर उत्तम स्‍वास्‍थ्‍य प्रदान करने की प्रार्थना करें।

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